छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाको के किसान, बंदरों से परेशान हैं। बंदरों का झुंड खेत में तैयार फसलों को चट कर जा रहा है। बंदरों से होने वाले नुकसान के कारण कई इलाकों में छोटे किसानों ने दलहन-तिलहन की फसल लगानी बंद कर दी है। चना, मूंगफली, तिल, तिवरा और अरहर की खेती बुरी तरह से प्रभावित हुई है। राज्य सरकार के आंकड़े भी बताते हैं कि इन फसलों का रकबा पिछले कुछ सालों में तेज़ी से घटा है। कई इलाकों में बंदर हमलावर हो रहे हैं और लोगों को भी निशाना बना रहे हैं।

इन बंदरों से बचने के लिए कहीं चौकीदार रखे जा रहे हैं तो कहीं शिकारियों को बुलाया जा रहा है। पिछले कुछ सालों में बंदरों को मार डालने के भी मामले सामने आए हैं। लेकिन पूरे राज्य में फैले मकाक और लंगूर प्रजाति के बंदरों से छुटकारा मिलता नज़र नहीं आ रहा है।

पिछले कुछ सालों में बंदरों की समस्या तेज़ी से बढ़ी है। खेत की फसलों को तो ये बंदर चट कर ही रहे हैं, घरों के पीछे लगी बाड़ी की सब्जियों को इन बंदरों से बचाना मुश्किल हो रहा है। छोटे किसानों को भी हर दिन की सब्जी के लिए बाज़ार का रुख करना पड़ रहा है। बड़े और व्यावसायिक फॉर्म हाउस में उगने वाली सब्जियों की क़ीमत भी आसमान पर रहती हैं, इसलिए गांव के लघु और मध्यमवर्गीय किसानों का सारा बजट गड़बड़ा रहा है।

धान का भंडार कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में धान की कटाई के तुरंत बाद उन खेतों में ‘उतेरा’ के तौर पर दाल के बीज छिड़क दिए जाते थे। स्वाभाविक नमी के कारण दाल की फसल उग जाती थी। लेकिन बंदरों के कारण पिछले दस सालों से ‘उतेरा’ की परंपरा ही ख़त्म होने को है।

राज्य सरकार के आंकड़े भी बताते हैं कि साल दर साल दलहन-तिलहन जैसी फ़सलों का रकबा राज्य में कम होता चला गया है। हालांकि कृषि के जानकार मानते हैं कि दलहन-तिलहन और दूसरी फसलों का रकबा कम होने के पीछे एक कारण यह भी है कि राज्य में धान का समर्थन मूल्य 2500 रुपये होने के बाद लोगों ने धान की फसल लगाने पर अधिक ध्यान दिया है। लेकिन सभी यह स्वीकार करते हैं कि छोटे और मंझौले किसानों के दलहन-तिलहन नहीं उगाने के पीछे बंदरों की सबसे बड़ी भूमिका है।

कृषि विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध 2019 तक के आंकड़े बताते हैं कि 2015 से 2019 के बीच राज्य में मूंग दाल का रकबा 64.34 फीसदी तक कम हो गया है। इसी तरह इन पांच सालों में अरहर का रकबा 65.11 हज़ार हेक्टेयर से घट कर 35.81 हज़ार हेक्टेयर रह गया है। यानी इन पांच सालों में किसानों ने 45 फीसदी हिस्से में अरहर लगाना बंद कर दिया है। राज्य में 2015 में 120.13 हज़ार हेक्टेयर में सब्जी लगाई गई थी। 2016 में सब्जी का रकबा बढ़ कर 143.38 हज़ार हेक्टेयर हो गया लेकिन 2019 में यह 95.39 हज़ार हेक्टेयर में सिमट कर रह गया। दूसरी फसलों का भी यही हाल है।

बंदरों द्वारा खेती के नुकसान के साथ-साथ बच्चों और महिलाओं पर भी हमले की घटनाएं भी सामने आने लगी हैं। बंदरों के कारण खपरैल घरों में रहने वालों की मुश्किलें पिछले कुछ सालों में तेज़ी से बढ़ी हैं। खपरैल घरों पर बंदरों के इधर से उधर भागने-दौड़ने के कारण तो नुकसान होता ही है, भोजन की तलाश में बंदर खपरे हटा कर छत के रास्ते से घर में घूसने की कोशिश भी करते हैं। यही कारण है कि जिन खपरैल छतों की मरम्मत साल-दो साल में होती थी, अब साल में दो बार उनकी मरम्मत करनी होती है।

इन बंदरों से बचाव के लिए समय-समय पर कुछ उपाय भी किए गए लेकिन ऐसे उपाय नाकाफी साबित हुए हैं। रायगढ़ ज़िले में तो एक सर्वसुविधायुक्त बंदर नसबंदी केंद्र भी स्थापित किया गया। प्रशिक्षण के लिए पशु चिकित्सकों को हिमाचल प्रदेश भेजा गया। नसबंदी का काम भी शुरु किया गया लेकिन इन बंदरों को पकड़ना सबसे मुश्किल काम था, जिसके लिए कभी कोई कार्ययोजना ही नहीं बनी। मादा बंदरों की नसबंदी की कोई व्यवस्था नहीं थी। नसबंदी के दौरान उपलब्ध दवाओं की भी कमी थी। ऐसे में बीस से भी कम बंदरों की नसबंदी के बाद, लाखों रुपये खर्च कर शुरु की गई बंदरों की नसबंदी की योजना कुछ सालों के भीतर ही दफ़्न हो कर रह गई।

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