कल्पना करें कि कैंसर के किसी रोगी की चिकित्सा का काम किसी अप्रशिक्षित शिशु रोग विशेषज्ञ के जिम्मे सौंप दिया जाये तो क्या होगा? निसंदेह कैंसर पीड़ित को कोई राहत मिल पायेगी, इसकी गुंजाइश तो नहीं ही है. उल्टे हो सकता है कि किसी प्रयोग की कोशिश में पीड़ित की जान पर बन आये. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के वन अमले का हाल कुछ ऐसा ही है. दोनों ही राज्यों में वन्यजीव प्रबंधन ऐसे ही दौर से गुजर रहा है.
देश में 1972 में जब वन्यजीव संरक्षण अधिनियम लागू हुआ, उसके बाद से ही इस बात की ज़रुरत महसूस होने लगी कि वन्यजीवों का संरक्षण करना है तो वन अमले में ऐसे अफसरों का होना अनिवार्य है, जिनकी विशेषज्ञता वन्यजीव प्रबंधन में हो. संकट ये था कि न तो विश्वविद्यालयीन पाठ्यक्रमों में विशेष रुप से वन्यजीवों पर केंद्रित पाठ्यक्रम थे और ना ही भारतीय वन सेवा के प्रशिक्षण में ही इसे बहुत अधिक महत्व मिला था. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम लागू होने के बाद आरंभिक तौर पर वन अमले के अफसरों के लिये वन्यजीव प्रबंधन के प्रशिक्षण की औपचारिक शुरुआत हुई. लेकिन व्यवस्थित रुप से यह सिलसिला 1982 में देहरादून में भारतीय वन्यजीव संस्थान की स्थापना के बाद ही हो पाई. भारतीय वन्यजीव संस्थान की विश्वसनीयता और प्रशिक्षण की गुणवत्ता ने दुनिया भर के लोगों को आकर्षित किया और आज की तारीख में दक्षिण एशिया व दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों के लोग इस महत्वपूर्ण संस्थान में प्रशिक्षण लेने के लिये पहुंचते हैं.
लेकिन वन्यजीव संरक्षण अधिनियम लागू होने के लगभग 50 साल बाद, आज भी जाने क्यों वन्यजीव प्रबंधन को हमारे ही देश में हाशिये पर रख दिया गया है. कम से कम मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में तो शायद यह मान लिया गया है कि वन्यजीवों का प्रबंधन कोई भी कर सकता है. यही कारण है कि अधिकांश राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्यों में निदेशक के पद पर ऐसे लोगों को नियुक्त किया गया है, जिनका वन्यजीव प्रबंधन की दक्षता से कोई लेना-देना नहीं है. यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं है कि कुछ निदेशक अपने अनुभव के आधार पर संभवतः स्व अध्ययन और रुचि के कारण किसी प्रशिक्षित अधिकारी से भी बेहतर काम कर सकते हों लेकिन इसे अपवाद ही माना जा सकता है. यही कारण है कि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने भी समय-समय पर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किये हैं कि वन्यजीव वाले इलाकों में विशेष रुप से प्रशिक्षित अधिकारियों की ही नियुक्ति की जाये. लेकिन इस तरह के दिशा-निर्देश हाशिये पर हैं. इसका दुखद पहलू ये है कि कई ऐसे अधिकारी, जो वन्यजीवों के मामले में प्रशिक्षित हैं, उन्हें सरकार ने मुख्यालयों में बाबूगिरी के काम में लगा रखा है. अधिकांश मामलों में महज सैर-सपाटे के लिये विदेशों का कथित अध्ययन दौरा करने के बजाये उस बजट से अधिकारियों के साथ-साथ जंगल में तैनात कर्मचारियों को भी वन्यजीव प्रबंधन का विशेष प्रशिक्षण दिया जा सकता है. वन्यजीवों को बचाना है तो देर-सबेर सरकारों को इस दिशा में पहल करनी ही होगी लेकिन क्या सरकारें सच में ऐसी कोई इच्छाशक्ति रखती हैं?

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